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रूस से रिश्ते बहुत ही नाजुक मोड़ पर, भारत पहुंचे रूसी विदेश मंत्री लावरोव, जयशंकर के साथ होगी आज अहम बैठक

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव दो दिवसीय यात्रा पर बीती रात सोमवार को दिल्ली पहुंच गए। उनकी यह यात्रा तब हो रही है जब दोनों देशों के ऐतिहासिक और बेहद मजबूत रिश्तों में कुछ तनाव आने के संकेत दिख रहे हैं। लावरोव की मंगलवार को विदेश मंत्री एस. जयशंकर के संघ मुलाकात होगी जिसमें तमाम द्विपक्षीय मुद्दों के अलावा ब्रिक्स, एससीओ और आरआइसी (रूस, भारत, चीन) जैसे संगठनों की भावी बैठकों को लेकर भी चर्चा होगी। बैठक में रूस से खरीदे जाने वाले एंटी मिसाइल सिस्टम एस-400 को लेकर भी चर्चा होगी। साथ ही भारत की पूरी कोशिश होगी कि अफगानिस्तान में चल रही शांति समझौते की प्रक्रिया को लेकर भी रूस का पक्ष जाना जाए कि वह भारत को कितनी अहमियत दे रहा है।

दोनों देशों के बीच वार्ता करने के लिए तमाम तरह के विषय हैं, लेकिन लावरोव की इस यात्रा के दो पहलुओं से समझा जा सकता है कि भारत व रूस के कूटनीतिक रिश्तों में सब कुछ सामान्य नहीं है। पहली बात तो यह कि भारत की यात्रा के बाद लावरोव सीधे पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद जाएंगे। वर्ष 2012 के बाद रूस का कोई विदेश मंत्री पाकिस्तान की यात्रा पर अब इस वर्ष जाएगा, लेकिन यह पहली बार है कि रूस का कोई बड़ा नेता भारत आने के बाद पाकिस्तान की यात्रा पर जा रहा है।

दूसरी बात यह है कि भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ से लावरोव की यात्रा का जो एजेंडा सोमवार को उपलब्ध कराया गया है उसमें उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात का कोई जिक्र नहीं है। अगर ऐसा होता है तो यह काफी आश्चर्यजनक होगा क्योंकि अमूमन सभी प्रमुख देशों के विदेश मंत्री नई दिल्ली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री से भी अलग से ज़रूर मुलाक़त करते हैं।

पाकिस्तान लावरोव की यात्रा को अपनी एक बड़ी कूटनीतिक जीत के तौर पर सामने पेश कर रहा है। जानकारों के मुताबिक लावरोव की इस्लामाबाद यात्रा अफगान शांति वार्ता में पाकिस्तान को केंद्र में लाने के साथ ही रूस, चीन के साथ पाकिस्तान के मजबूत हो रहे गठबंधन की तरफ इशारा करती है। कई अंतरराष्ट्रीय जानकार यहां तक लिख रहे हैं कि अमेरिका और चीन के बीच बंट रहे वैश्विक समुदाय का आगाज हो रहा है। एक तरफ अमेरिका, भारत, जापान, आस्ट्रेलिया व दूसरे लोकतांत्रिक देश होंगे तो वहीं दूसरी तरफ चीन, रूस, पाकिस्तान, तुर्की जैसे देश।

कुछ जानकारों के मुताबिक यह भी बोलना है कि भारत अब रूस का बड़ा हथियार खरीदार देश नहीं रहा, ऐसे में रूस पाकिस्तान को अपने भावी बाजार के नजरिये से देख रहा है। वैसे भारत अभी भी रूस से अपनी जरूरत का 60 फीसद सैन्य साजों-समान खरीदता है। एक दशक पहले यह 90 फीसद था। अमेरिकी प्रतिबंध के बावजूद भारत ने एस-400 एंटी मिसाइल सिस्टम खरीदने का फैसला किया और अभी तक इस पर अडिग है। इसकी आपूर्ति अगले वर्ष से होने की संभावना दिखाई दे रही है।

सनद रहे कि पिछले वर्ष जब भारत और रूस के बीच होने वाली सालाना शिखर बैठक का आयोजन नहीं किया गया था तब भी दोनों देशों के रिश्तों में तनाव की बातें हुई थीं। लावरोव और जयशंकर के बीच बैठक में आगामी शिखर बैठक को लेकर भी चर्चा होगी। संभव है कि जयशंकर रूस व पाकिस्तान के बढ़ते संबंधों को लेकर अपनी चिंता सामने रखें।

वैसे भारत की चिंताओं को दरकिनार कर रूस अब सालाना तौर पर पाकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास भी करने लगा है। दोनों देशों के बीच अंतिम सैन्य अभ्यास नवंबर, 2020 में हुआ है। अब जबकि अफगानिस्तान में पाकिस्तान समर्थक तालिबान की सत्ता में वापसी की गुंजाइश बढ़ती जा रही है तब रूस पाकिस्तान के साथ और करीबी रिश्ता बनाने को इच्छुक है।

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